मंगलवार, 26 अगस्त 2008

दो किनारों से पहले


देह एक केनवस की तरह होती है
फिर तुम मिले
केनवस पर रंग उभरने लगे
रंगों में सांस आने लगी
लकीरों में आकार उभरने लगे
आकार अपनी धुन में थे
कुछ कह रहे थे
रंगों ने सुना
उन पर निखार आ गया
बहार सी बरसने लगी
फिर देखते देखते केनवस पर समंदर फैल गया
तभी एक नूर सा उभरा समंदर में
उसने हाथ उठा कर दिया आशीर्वाद
कुछ देर के बाद नूर अलोप हो गया
समंदर भी अलोप हो गया
देह और रंग भी गायब थे
कैनवस पर रहे गये
दो किनारे
जिनके बीच बह रही थी निर्मल धारा

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

मन को एक कागज पर उतारना

मन को एक कागज पर उतारना
जैसे झील में नहा लेना
और फिर से तरोताजा हो जाना
मन की सारी बातें उसमें रल जाना
फिर उसे रोज रोज देखना
और उसमें से अपने को खोजना
यह सिलसिला चलता रहता है
ऐसे ही
एक दिन झील को बुदबुदाते सुना
´चलते चलते थक गई हूं
देखने गयी थी उस पौधे को
जिसका कद तो ज्यादा नहीं था
टहनियां भी कम थी
कोई फूल भी नहीं था
जैसे किसी ने उसे सींचा ही न हो
फिर देखा उसकी जड़ों को
देख के दंग रह गई
जड़ें थी कि जमीन के सीने पर लिपटी हुई थी
दूर तक फैली हुई थी
बिलकुल ताजा और तंदरूस्त
बरसों से जी रही थी एक कहानी को`
झील का बुदबुदाना सुन मैं हंस दी
सोचा तुम भी देखते
जमीन के सीने पर लिपटी जड़ें
जो दूर तक फैल चुकी हैं
तंदरूस्त हैं ताजा हैं
पर जमीन में दबी हैं--
Manvinder Bhimber

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

सुनती हो जी

मां व्यस्त रहती थीं सुबह से
घर के कामों को निपटाने में
हमारी किताबें लगाने में
बाबू जी की आफिस की तैयारी में
उनकी बिखरी चीजों को समेटने में
उनकी कमीज में बटन टांकने में
सांझ को जब बाबू जी आते
और हम घर सिर पर उठाते
तो बाबू जी कहते,
सुन रही हो
आयो तुम भी बैठो कुछ देर को
आती हूं जीकुछ चाहिए है आपको
पूछ कर मां लौट आती
इतना कह कर मां लग जाती अगले काम में
आज मां नहीं है हमारे बीच
बाबू जी हैं
अब कोई उनके बटन नहीं टाकता है
बाबू जी अकसर आपने टूटे बटन को छू कर
एक आह सी भरते हैं
और मन में बुदबुदाते हैं
सुनती हो जी
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देखो....देखो

देखो
अब तुम ये मत कहना
मैं चांद को न देखूं
बरसती चांदनी को निहारना छोड़ दूं
मुझे मत रोको
करने दो मुझे भी मन की
आज का चांद मैं देखूंगी
पूर्णमासी का चांद
बरसती चांदनी मैं निहारूंगी
तुमको गर ये सुहाता है
तो आओ मेरे संग बैठो
लेकिन मुझे मत रोको
करने दो मुझे भी मन की
मुझे मत रोको

स्वयं को खोजने का हक नहीं है मुझे?

पैदा हुई तो बेटी हो गई
बड़ी हुई तो बहन हो गई
ब्हायी गई तो पत्नी हो गई
घर की लक्ष्मी हो गई
फिर सौभाग्यवती हो गई
क्यों कि मैंने ओढ़ ली जिम्मेवारियों की चुनरी
इन सब में मैं कहां थी?
इसका जवाब खोजना चाहा तो
न बेटी-बहन रही न पत्नी रही
न सौभाग्यवती रही
न घर की लक्ष्मी रही
स्वयं को खोजने का हक नहीं है मुझे?

मेरे लिये जरूरी नहीं है

मेरे लिये जरूरी नहीं है
तुम्हारे सुर में सुर मिलायूं
तुम्हारी हां को स्वीकारूं
तुम्हारे तय किये निर्णय मानूं
तुम्हारे कंधे का सहारा लूं
तुम्हारी राह तकूं
क्योंकिअपने अंदर की स्वयंसिद्धा मैं पहचान गई हूं
तुम्हें भी जान गई हूं
मौका पड़े तो भरी सभा मेंदेख सकते हो मेरा चीर हरण
इक जरा सी बात परदे सकते हो जगलों की भटकन

मल्लाह आज आहत है

मल्लाह आज आहत है
फिर से कुछ पाने की चाहत है
उसकी वजह है नदी, तूफानी नदी
नदी जो सालों से चुप चाप सी बह रही थी
नदी जो सालों से बोझ को सह रही थी
उसमें उठ आये हैं तूफान
इसी लिये
मल्लाह आज आहत है
फिर से कुछ पाने की चाहत है
उसे चुप चाप बहती नदी में नाव खेने की आदत रही
उसे अपनी मस्ती में लहरों को रोंदने की आदत रही
पर आज नाव डोल रही है क्योंकि
नदी ने चुप्पी तोड़ दी है
उसमें उठ आये हैं तूफान
मल्लाह को समझ नहीं आ रहा है ,क्या जुगत लगाए
तूफानी लहरों पर कैसे काबू पाए
मल्लाह आज आहत है
फिर से कुछ पाने की चाहत है