बुधवार, 10 सितंबर 2008

काश ! लौटना भी सिखा देती

तुम मेरे परिंदे हो
तुम्हारा घोंसला मुझे आज भी याद
मैंने तुम्हें उड़ना सिखाया
तुम उड़े
लंबी उड़ान पर
लौटे नहीं
क्योंकि
तुम नहीं सीखे
कैसे लौटते हैं

4 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Arvind Mishra ने कहा…

मैं तो यही कहूंगा -नीड़ का निर्माण फिर फिर !!

Udan Tashtari ने कहा…

क्योंकि
तुम नहीं सीखे
कैसे लौटते हैं

--आह्ह्!! काश सीख लिया होता-यही अफसोस हरदम रहता है. बहुत गहरी रचना है. बहुत बहुत बधाई.

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

आज आपके लेखन की याद आई तो आपके इस ब्लॉग पर चला आया, देखा तो कुछ नया नहीं लिखा है आपने कई दिनों से.. प्लीज़ कुछ नया लिखे जरुर. आपके शब्दों का जादू दिल में उतरता है . जैसे इस कविता ने किया है .. काश !!!!!

बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html