सोमवार, 1 सितंबर 2008

बड़ा दर्द सहा है तुमने

ऊफ !
ये कांटा
तुम्हारे पैर में कैसे चुभा ?
कितनी तीखी है इसकी नोक
हाय !
बड़ा दर्द सहा है तुमने
इसकी टीस जल्दी नहीं जाएगी
इक बात बताओ
तुम काँटों की राह पर चलने को मजबूर थे
या
किसी ने तुम्हारी राह में किसी ने कांटें बिखेर दिए

5 टिप्‍पणियां:

parul ने कहा…

bhut koob likha apne. dusare ka dard smaj lati app.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत खूब लिखा है जी आपने

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

चार लाईनों में बेहतर संदेश दिया है आपने, आभार ।

विक्रांत बेशर्मा ने कहा…

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है !!!!!!!!!

ilesh ने कहा…

bahot hi umda....ya kabhi khud majboor hote he kant se bahri raah par chalne..kabhi koi majboor karta he aur sayad yahi zindgi ka nichod he