मंगलवार, 26 अगस्त 2008

दो किनारों से पहले


देह एक केनवस की तरह होती है
फिर तुम मिले
केनवस पर रंग उभरने लगे
रंगों में सांस आने लगी
लकीरों में आकार उभरने लगे
आकार अपनी धुन में थे
कुछ कह रहे थे
रंगों ने सुना
उन पर निखार आ गया
बहार सी बरसने लगी
फिर देखते देखते केनवस पर समंदर फैल गया
तभी एक नूर सा उभरा समंदर में
उसने हाथ उठा कर दिया आशीर्वाद
कुछ देर के बाद नूर अलोप हो गया
समंदर भी अलोप हो गया
देह और रंग भी गायब थे
कैनवस पर रहे गये
दो किनारे
जिनके बीच बह रही थी निर्मल धारा

5 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

कैनवस पर रहे गये
दो किनारे
जिनके बीच बह रही थी निर्मल धारा

अच्छी लगी यह बहुत

hindu divine ने कहा…

Accha laga canvas ko apne mool roop me aate dekh..........

विक्रांत बेशर्मा ने कहा…

कैनवस पर रहे गये
दो किनारे
जिनके बीच बह रही थी निर्मल धारा
बहुत अच्छे भावः हैं !!!!!!सुंदर रचना !!!

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

फिर देखते देखते केनवस पर समंदर फैल गया
तभी एक नूर सा उभरा समंदर में
उसने हाथ उठा कर दिया आशीर्वाद
कुछ देर के बाद नूर अलोप हो गया
समंदर भी अलोप हो गया
बहुत गंभीर भाव पूर्ण कविता बधाई
कृपया पधारे manoria.blogspot.com and kanjiswami.blog.co.in

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह.. सुंदर भाव चित्रण..
बधाई एवं धन्यवाद.