गुरुवार, 24 जुलाई 2008

झरने में कैकट्स

रात को वो अकसर चुपचाप आता है
दिल का दरवाजा खटखटाता है
पहले तो सोचती हूं कि न खोलूं कुंडी
फिर सोचती हूं कि आने दूं उसे अंदर
कुंडी खोलती हूं
वो अंदर आ जाता है
हम जंगलों की ओर निकल जाते हैं
वो मुझे बहते झरने दिखाता है
उसमें उगे कैकटस मुझे हैरान करते हैं
कुछ देर बाद
हम दूसरे युग में पहुंच जाते हैं
अचानक मुझे लगता है
मेेरे पैर कई काल चल चुके हैं
मैं कई जन्मों को गले मिल चुकी हूं
झरने का ख्याल आता है
कैकटस जेहन में उभरता है
खुद ही हंसती हूँ

झरने में कैंकटस
दिल के दरवाजे पर फिर कुंडी लग जाती है


मनविंदर भिंभर

6 टिप्‍पणियां:

Omkar Chaudhary ने कहा…

jharno ke beech bhi ug ate hai kaiktas.
kaiktas mai bhi khilte hai fool kabhi kabhi..
jaroori nahi har fool ki pankhuri
naram lage hatho ko
foolo ki ot mai chhipe milte hai kante kabhi kabhi..

omkar, meerut

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत गहरा सा सपना है यह कोई पर मन की अन्तर्दशा को बताता हुआ अभी में इस पर सोच रही हूँ क्यूंकि तुमने विषय बहुत प्यारा लिया है ब्लॉग नया सजा व नाम अच्छा लगा या यह नया ब्लॉग है ?

Amit K. Sagar ने कहा…

बेहतर. लिखते रहिये.

रोशन प्रेमयोगी ने कहा…

apki kavita achhi hai
kaiktus kaner ki tulana me jyada vafadar hota hai
roshan premyogi
roshan.premyo@gmail.com

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

अचानक मुझे लगता है
मेरे पैर कई काल चल चुके हैं

वाह कमाल का ख़्याल पिरोया है शब्दों में!

No Mad Explorer.... ने कहा…

Its amazing thought !!! Dichotomhy of Mind is what it depicts !!!