शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

बेजुबान दास्तां

मुद्दत बाद तुम आये
तकिये का गिलाफ तुम्हें बहुत पसंद आया
उस पर उकेरे गये फूल पत्ते तुम्हें भाये
तकिये की बेजुबान दास्तं लेकिन तुम्हें न दिखी
मन में आया
तुम्हें बतायूं
यह तकिया गवाह है
उन पलों का
जब दिल में उठा तूफान
और तकिये में समा गया
सालों यह सिलसिला चलता रहा
और तकिया अपने में समेटता गया मेरे पल
वो कुछ पल
जो मुझे याद आते
जब उन पलों में कभी मैं थमती
कभी फिर चल देती
पता नहीं फूल पत्तों वाला गिलाफ इसकी
किसमत है या रब की मजी
मैं चाहती हूं ये गिलाफ इस पर रहे
ताकि इसकी नमी
इसी में दफन रहे

3 टिप्‍पणियां:

ilesh ने कहा…

wah manvinder kamaal kar diya..vo dasta jo takiya kabhi sunane wala nahi magar ha vo har us pal ko khud me simte baitha he.... jo pal kabhi khushi de gaye kabhi gam....bahot khub

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

वाह बहुत सुंदर जी ..तकिया बिम्ब अच्छा चुना है

amar ने कहा…

बहुत ख़ूब।