मंगलवार, 19 अगस्त 2008

सुनती हो जी

मां व्यस्त रहती थीं सुबह से
घर के कामों को निपटाने में
हमारी किताबें लगाने में
बाबू जी की आफिस की तैयारी में
उनकी बिखरी चीजों को समेटने में
उनकी कमीज में बटन टांकने में
सांझ को जब बाबू जी आते
और हम घर सिर पर उठाते
तो बाबू जी कहते,
सुन रही हो
आयो तुम भी बैठो कुछ देर को
आती हूं जीकुछ चाहिए है आपको
पूछ कर मां लौट आती
इतना कह कर मां लग जाती अगले काम में
आज मां नहीं है हमारे बीच
बाबू जी हैं
अब कोई उनके बटन नहीं टाकता है
बाबू जी अकसर आपने टूटे बटन को छू कर
एक आह सी भरते हैं
और मन में बुदबुदाते हैं
सुनती हो जी
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4 टिप्‍पणियां:

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

यह वही समय जहाँ दो जिस्म एक जाँ अगर दोनों में से एक भी साथ छोड़ दे तो दूसरा उसके साथ बीते हुए पल भुला नहीं पाता, क्या करें सब प्रकृति का नियम है!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत भावपूर्ण

Neeti ने कहा…

मार्मिक। अत्यन्त सुंदर।

Apanatva ने कहा…

aankho me aansoo la dene walee rachana.............