गुरुवार, 21 अगस्त 2008

मन को एक कागज पर उतारना

मन को एक कागज पर उतारना
जैसे झील में नहा लेना
और फिर से तरोताजा हो जाना
मन की सारी बातें उसमें रल जाना
फिर उसे रोज रोज देखना
और उसमें से अपने को खोजना
यह सिलसिला चलता रहता है
ऐसे ही
एक दिन झील को बुदबुदाते सुना
´चलते चलते थक गई हूं
देखने गयी थी उस पौधे को
जिसका कद तो ज्यादा नहीं था
टहनियां भी कम थी
कोई फूल भी नहीं था
जैसे किसी ने उसे सींचा ही न हो
फिर देखा उसकी जड़ों को
देख के दंग रह गई
जड़ें थी कि जमीन के सीने पर लिपटी हुई थी
दूर तक फैली हुई थी
बिलकुल ताजा और तंदरूस्त
बरसों से जी रही थी एक कहानी को`
झील का बुदबुदाना सुन मैं हंस दी
सोचा तुम भी देखते
जमीन के सीने पर लिपटी जड़ें
जो दूर तक फैल चुकी हैं
तंदरूस्त हैं ताजा हैं
पर जमीन में दबी हैं--
Manvinder Bhimber

4 टिप्‍पणियां:

amar ने कहा…

'मन को… और फिर से तरोताज़ा हो जाना'- सर्जना की पूरी प्रक्रिया समेट दी है आपने कुछ ही शब्दों में।
बहुत ख़ूब!

ilesh ने कहा…

nice thoughts manvinder.....ba khubi man ko kaghaj par utara he aapne kaash sab jamin par faili uski taro taja jado ko dekh pate....

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सुंदर और दिल को छूती हुई रचना

seema gupta ने कहा…

मन को एक कागज पर उतारना
जैसे झील में नहा लेना
और फिर से तरोताजा हो जाना
मन की सारी बातें उसमें रल जाना
फिर उसे रोज रोज देखना
"bhut khubsuret, maan ko kagej pr utarna utna aaan nahee hotta, magar aapne kitne komalta or sehjta se mann ko kagaj pr uttara hai, ek ek word dil mey utera sa jata hai" wonderful poetry liked it ya"

Regards